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1M-13 Sutra ke Arth ka Punaravartan Game

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भूमिका - जो सूत्र का हररोज उपयोग होता है, उसके अर्थ अच्छी तरह से आना चाहिए, अर्थ आयेगा तो हि क्रिया में भाव आयेगा. अर्थ को पक्का करने के लिए ही, यह प्रयत्न है

 

व्यवस्था
१) स्पर्धा के २ दिन पहले ही, हरेक स्पर्धक को अर्थ मुखपाठ करने के लिए दे दो।
२) टीचर अगर चाहे तो, सूत्र और अर्थ दोनो की अथवा सिर्फ अर्थ की स्पर्धा रख सकते हैं
३) टीचर अगर चाहे तो, सिर्फ सूत्र को सामने रखने की छूट दे सकते है, उसके आधार पन स्पर्धक को स्वयं अर्थ बोलना है
४) १ मीनट स्पर्धा अथवा ३ बार बोलना, जो सबसे पहले सही बोले वो विजेता ।


नवकार सूत्र का अर्थ
अरिहंत भगवंतों को नमस्कार हो, सिद्ध भगवंतों को नमस्कार हो, आचार्य भगवंतों को नमस्कार हो, उपाध्याय भगवंतों को नमस्कार हो, सर्व साधु भगवंतों को नमस्कार हो, ए पांच नमस्कार सर्व पापको नाश करनेवाले है, सर्वे मंगलों में प्रथम मंगल है 

 

पंचिंदिय सूत्र का अर्थ
पांच इन्द्रियों के विषय को रोकनेवाले तथा नव प्रकार के ब्रह्मचर्य की गुप्ति को धारण करनेवाले, चार कषाय से मुक्त, यह अठारह गुणों से संयुक्त । पांच महाव्रत से युक्त, पांच प्रकार के आचार को पालन करने में समर्थ, पांच समितिवाले, तीन गुप्तिवाले ए छत्तीस गुणवाले मेरे गुरु है ।


इच्छकार सूत्र का अर्थ
हे गुरुजी ! सुख से रात, सुख से दिन व्यतीत हुआ ? सुख से तपश्चर्या होती है ? शरीर रोगरहित है ? सुख संयमयात्रा का निर्वाह हो रहा है ? हे स्वामि ! शाता है जी ? भोजन पानी का लाभ देनाजी ।

 

अब्भुट्ठिओ सूत्र का अर्थ
जो कुछ भी भोजन संबंधी, जल संबंधी, विनय संबंधी, वैयावच्च संबंधी, एक बार कहने से, बार-बार कहने से, गुरु से ऊंचे आसन पर बैठने से, समान आसन पर बैठने से, गुरु कहते है तभी बीच में बोलने से, गुरु ने बतायी हुइ बात ज्यादा बोलने से,
जो कुछ भी छोटा या बडा, मुझ से अविनय हुआ हो, जो आप जानते हो, मैं नहीं जानता, वह मेरा दुष्कृत (पाप) मिथ्या (नाश) हो ।

 

 

ईरियावही सूत्र अभिहया से मिच्छामि दुक्कडम् का अर्थ
अभिहया', वत्तिया, लेसिया, संघाड्या, संघट्टिया', परियाविया, किलामिया, उद्दविया


ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छा मि दुक्कडं (७)


ठोकर से मरे हो, धूल से ढका हो, जमीन के साथ कुचले गये हो, परस्पर शरीर द्वारा टकरा गये हो, थोडे से स्पर्श से दुःखी किया हो, परिताप उपसाया हो, मरने जैसा किया हो, त्रास पहोंचाया हो, एक स्थान से दूसरे स्थान रखा हो, प्राण से अलग किया हो वह संबंधी मेरा दुष्कृत मिथ्या हो इसलिए उस पाप की माफी मांगता हूं ।

 

अन्नत्थ सूत्र का अर्थ
(१) ऊँचा श्वास लेने से, (२) नीचा श्वास रखने के कारण, (३) खाँसी आने से, (४) छींक आने से, (५) जम्हाई आने से (६) डकार आने से (७) अधोवायु के छुटने से (८) चक्कर आने से (९) पित्त के प्रकोप से मूर्च्छा होने से,

सूक्ष्म शरीर का संचार होने से, सूक्ष्म थूक या कफ का संचार होने से, सूक्ष्म दृष्टि का संचार होने से ।

 

लोगस्स सूत्र की २,३,४, गाथा का अर्थ
श्रीऋषभदेव को और श्रीअजितनाथ को मैं वंदन करता हूँ ।
श्रीसंभवनाथ को, श्रीअभिनंदनस्वामी को, श्रीसुमतिनाथ को, श्रीपद्मप्रभस्वामी को, श्रीसुपार्श्वनाथस्वामी को और श्रीचंद्रप्रभस्वामी को में वंदन करता हूँ।


श्रीसुविधिनाथ जिनका दूसरा नाम पुष्पदंतस्वामी को, श्रीशीतलनाथ को, श्रीश्रेयांसनाथ को, श्रीवासुपूज्य स्वामी को, श्रीविमलनाथ, श्रीअनंतनाथ श्रीधर्मनाथ को और श्रीशांतिनाथ को मैं वंदन करता हूँ ।


श्रीकुंथुनाथ को, श्रीअरनाथ को, श्रीमल्लिनाथ को, श्रीमुनिसुव्रतस्वामी को और श्रीनमिनाथ को वंदन करता हूँ । श्रीअरिष्ठ नेमिनाथ को, श्रीपार्श्वनाथ, को और श्रीवर्धमानस्वामी को वंदन करता हूँ ।


Note: This is only for knowledge. You can manage yourself.

जगचिंतामणी सूत्र पार्ट - १


जगचिंतामणि जगनाह, जगगुरु, जगरक्खण, जगबंधव, जगसत्थवाह, जगभावविअक्खण,


अट्ठावय संठविअ रूव, कम्मट्ठ विणासण, चउवीसंपि जिणवर जयंतु अप्पडिहयसासण (१)


भव्य जीवों के लिए चिंतामणि रत्न समान, भव्य जीवों के नाथ, जगत के गुरु, छ जीव निकाय के रक्षक, सकल जीव के बंधु, मोक्षाभिलाषी के सार्थवाह, जगत में रहे हुए छ द्रव्य को कहने में विचक्षण, अष्टापद पर्वत ऊपर स्थापन की हुई है प्रतिबिंब जिनकी, आठ कर्म का नाश करनेवाले, जिनका शासन किसी से नाश न हो सकता वैसे चौबीस तीर्थंकरों का जय हो ।

 

जगचिंतामणी सूत्र पार्ट - २
जयउ सामिअ जयउ सामिअ रिसह सत्तुंजि, उज्जिति पहु नेमिजिण, जयउ वीर सच्चउरिमंडण, भरुअच्छहिं मुणिसुव्वय,


मुहरि पास दुह दुरिअ खंडण, अवरविदेहिं तित्थयरा, चिहुं दिसि विदिसि जिंकेवि, तीआणागय संपअ, वंदुं जिण सव्वे वि (३)

अर्थ :- शंत्रुजय उपर ऋषभदेव, गिरनार पर्वत के उपर प्रभु नेमिनाथ का जय हो साचोर नगर को शोभा, देनेवाले महावीरस्वामी, भरुच में श्रीमुनिसुव्रतस्वामी और दुःख और पाप का नाश करनेवाले, मुहरी (हाल टींटोइ) गाँव में बिराजमान श्रीपार्श्वनाथ स्वामी का जय हो । दूसरे पाँच महाविदेह में जो तीर्थंकर हो और चार दिशा और विदिशाओ में भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमानकाल में जो कोई भी जिनेश्वर हो उन सभी को मैं वंदन करता हूँ ।

 

जयवीयराय सूत्र
जय वीयराय जगगुरु होउ ममं, तुह पभावओ भयवं भवनिब्बेओं, मग्गाणुसारिआ इट्ठफलसिद्धि (१)


लोगविरुद्धच्चाओ, गुरुजणपूआ परत्थकरणं च; सुहगुरुजोगो तब्बयण सेवणा आभवमखंडा (२)


अर्थ :- हे वीतराग ! हे जगत के गुरु, आपका जय हो, हे भगवंत ! मुझे आप के प्रभाव से संसार पर से वैराग्य, मोक्षमार्गमें चलने की शक्ति और इष्टफल की सिद्धि हो ।

लोक विरुद्ध का त्याग, वडिल जन की पूजा, दूसरों का भला करने की तत्परता सद्गुरु का योग, उनके वचनों की सेवा, संसार में हूँ वहां तक अखंडरूप से प्राप्त हो।

 

अरिहंत चेइआणं सूत्र
अरिहंत चेइआणं
करेमि काउरसग्गं
वंदणवत्तियाए,
पूअणवत्तियाए,


सक्कारवत्तियाए, सम्माणवत्तियाए बोहिलाभवत्तियाए निरुवसग्गवत्तियाए


अर्थ :- मैं अरिहंत की प्रतिमा को वंदना करने के लिए, पूजा करने के लिए, सत्कार करने के लिए, सन्मान के लिए, सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए, उपसर्गरहित स्थान के लिए कायोत्सर्ग करता हूँ ।


कल्लाण कंदं सूत्र
कुंदिंदुगोक्खीरतुसाखन्ना, । सरोजहत्था कमले निसन्ना;
वाएसिरी पुत्थयवग्गहत्था, सुहाय सा अम्ह सया पसत्था


अर्थ :- मचकुंद, चंद्र, गाय का दूध और हिम के समूह जैसी, श्वेत कायावाली, हाथ में कमल है जिनके, कमल ऊपर बैठी हुइ, पुस्तक को समुदाय है जिनके हाथ मैं, कल्याण करनेवाली, ऐसी वह श्रुतदेवी, हमको हंमेशा सुख के लिए हो ।

 

सिद्धाणं बुद्धाणं सूत्र पार्ट - १
जो देवाण वि देवो, जं देवा पंजली नमंसंति; तं देवदेवमहिअं, सिरसा वंदे महावीरं (२)
इक्कोवि नमुक्कारो जिणववसहस्स वद्धमाणस्स; संसारसागराओ, तारेइ नरं व नारिं वा (३)


अर्थ :- जो देवों के भी देव है, जिनको देवता भी अंजली करके नमस्कार करते है, जो देवों के देव से पूजित है, वह महावीर स्वामी को मैं मस्तक से वंदना करता हूँ।
जिनवर में श्रेष्ठ ऐसे वर्धमानस्वामी को किया हुआ एक भी नमस्कार पुरुष को या स्त्री को संसार समुद्र से पार करता हैं।


सिद्धाणं बुद्धाणं सूत्र पार्ट - २
उज्जितसेलसिहरे दिक्खा नाणं निसीहिआ जस्स; तं धम्मचक्कवहिं, अडिनेमिं नमंसामि (४)
चत्तारि अट्ठ दस दोय, वंदिया जिणवरा चउव्वीसं; परमट्ठनिट्ठिअट्ठा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु (५)


अर्थ :- गिरनार पर्वत के शिखर पर जिनकी दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्षकल्याणक हुआ है, उन धर्म चक्रवर्ती श्रीअरिष्टनेमि को मैं नमस्कार करता हूँ ।
चार, आठ, दस और दो, इस क्रम से वंदन किये हुए चौबीस जिनवर और परमार्थ से संतुष्ट, सिद्ध भगवंत मुझे सिद्धि पद दीजिए ।

 

पंचाचार सूत्र
नाणंमि दंसणंमि अ, चरणंमि तवंमि तह य वीरियंमि;
आयरणं आयारो, इअ एसो पंचहा भणिओ (१)


अर्थ :- ज्ञान के विषय में, दर्शन के विषय में, चारित्र के विषय में, तप के विषय में और वीर्य के विषय में आचरण को आचार कहा गया है, इस तरह के आचार के पाँच प्रकार कहे गये है ।

 

उपसर्गाः १८,१९ गाथा
उपसर्गाः क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्नवल्लयः; मनः प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनेश्वरे (१८)
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारणम्; प्रधानं सर्वधर्माणां, जैनं जयति शासनम् (१९)

अर्थ :- जिनेश्वर का पूजन करने से, उपद्रव नाश होते है, विघ्नरूप शाखाओं का छेदन होता है और मन प्रसन्न होता है।
सर्व मंगलो में मांगलिक, सर्व कल्याण का कारण और सर्व धर्मो में श्रेष्ठ ऐसा श्री जैनशासन जयवंत है ।

 

सकलतीर्थ ११,१२ गाथा
समेतशिखर वंदुं जिन वीश, अष्टापद वंदुं चोवीश; विमलाचल ने गढ गिरनार, आबु उपर जिनवर जुहार (११)
शंखेश्वर केसरिओ सार, तारंगे श्री अजित जुहार; अंतरिक्ख वरकाणो पास, जीराउलो ने थंभण पास (१२)


अर्थ :- समेतशिखर पर बीश जिनबिंब को और अष्टापद पर चौबीस जिनबिंब को तथा शत्रुंजय, गिरनार, आबु पर्वत पर स्थापित भव्य जिन प्रतिमाओं को मैं वंदन करता हूँ । स्तवना करता हूँ ।

सारभूत श्रीशंखेश्वर तीर्थ, श्रीकेशरियाजी तीर्थ, तारंगे श्रीअजितनाथ भगवान, अंतरिक्ष पार्श्वनाथ, वरकाणा पार्श्वनाथ, जिरावला पार्श्वनाथ और स्थंभन पार्श्वनाथ को मैं वंदना करता हूँ ।

 

१२ प्रकार का तप
अणसणमूणोअरिआ, वित्तिसंखेवणं रसच्चाओ; कायकिलेसो संलीणया य बज्झो तवो होइ (६)
पायच्छित्तं विणओ, वेयावच्चं तहेव सज्झाओ; झाणं उस्सग्गो वि अ, अब्भितरओ तवो होइ (७)


अर्थ :- चार प्रकार के आहार का त्याग वह अनशन (उपलक्षण से एकासणा, बियासना भी), पाँच सात, कवल कम खाना वह उणोदरी, कुछ द्रव्य से ज्यादा वपराश न करना वह वृत्तिसंक्षेप, दूध, दही, घी, गुड, तेल और कडा यह छ विगड़ में से एक, दो, तीन आदि विगई का त्याग वह रसत्याग, काया को कष्ट देना वह कायक्लेश, अंगोपांग संकोच रखना वह संलीनता, यह छ प्रकार से बाह्य तप है ।

जो दोष हुए हो, वह गुरु को बताकर, उस पाप से छूटने के लिए, गुरु जो शुद्धि दे वह करना वह प्रायच्छित्त तप, पूज्य की ओर मन, वचन, काया से नम्र भाव को प्रकट करना, वह विनय तप, गुरु प्रमुख की आहार आदि से भक्ति करना वह वैयावृत्त तप, वाचना, पृच्छना, परावर्तना, अनुप्रेक्षा, धर्मकथा यह पाँच प्रकार से अभ्यास करना वह स्वाध्याय तप, आर्त-रौद्रध्यान का त्याग करना, धर्म और शुक्लध्यान में रहना वह ध्यान तप, कर्मक्षय के लिए काया की प्रवृत्ति का त्याग करना वह कायोत्सर्ग तप, वह अभ्यंतर तप है ।
नोंध
: दोनो साथ में अथवा दो में से एक की स्पर्धा रख सकते हो

 

वंदितु गाथा ४९, ५०

खामेमि सव्वजीवे, सब्वे जीवा खमंतु मे; मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झ न केणइ (४९)
एवमहं आलोइअ, निंदिअ गरहिऊ, दुगंछिअं सम्मं; तिविहेण पडिक्कंतो, वंदामि जिणे चउव्वीसं (५०)


अर्थ :- सब जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सब जीवों मेरे अपराध को क्षमा करो, मेरा सब जीवों के साथ मैत्रीभाव है। मेरा कोइ जीव के साथ वैरभाव नहीं है इसी तरह मैं सम्यग् प्रकार से पाप की आलोचना करके, आत्मसाक्षी से निंदा करता हूँ, गुरुसाक्षी से गर्दा करता हूँ और जुगुप्सा करते हुए तीन प्रकार से पीछे हठता हआ चौबीस जिन को मैं वंदन करता हूँ

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